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कंडोम की कीमतों में 50 प्रतिशत की हो सकती है वृद्धि, कच्चे माल की सप्लाई ठप, तेल-गैस के बाद अमोनिया और सिलिकॉन ऑयल पर असर...

Aryan
6 April 2026 12:30 PM IST
कंडोम की कीमतों में 50 प्रतिशत की हो सकती है वृद्धि, कच्चे माल की सप्लाई ठप, तेल-गैस के बाद अमोनिया और सिलिकॉन ऑयल पर असर...
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कंडोम निर्माण में लुब्रिकेंट के रूप में इस्तेमाल होने वाले सिलिकॉन ऑयल की कीमतें बढ़ी हैं। दरअसल यह मुख्य रूप से चीन से आता है, लेकिन इसकी सप्लाई चेन रिफाइनरी प्रोसेस और ग्लोबल लॉजिस्टिक्स से जुड़ी है।

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट जारी जंग के बीच देश में कंडोम की कीमत में 50 फीसदी तक बढ़ोतरी हो सकती है, क्योंकि युद्ध के कारण सप्लाई चेन टूट गई है। इससे तेल और गैस के बाद अब कंडोम बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कमी हो रही है। कंडोम बनाने वाली दिग्गज कंपनियां जैसे HLL लाइफकेयर, मैनकाइंड फार्मा और क्यूपिड लिमिटेड को अमोनिया और सिलिकॉन ऑयल की कमी का सामना करना कर रहे हैं।

86 फीसदी आयात पर करता है भारत

भारत का कंडोम बाजार लगभग 1.7 बिलियन डॉलर मतलब लगभग 14 हजार करोड़ रुपए का है। कंडोम निर्माण में जरूरी 'एनहाइड्रस अमोनिया' के लिए भारत 86 प्रतिशत आयात पर निर्भर है, जो मुख्य रूप से सऊदी अरब, कतर और ओमान जैसे खाड़ी देशों से आता है।

हॉर्मुज रूट में युद्ध की वजह से सप्लाई हुई प्रभावित

हॉर्मुज रूट में युद्ध से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से सप्लाई ठप हो गई है। अमोनिया का इस्तेमाल लेटेक्स (रबड़) को जमने से बचाने और उसे सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। इसके बिना कंडोम बनाने वाली मशीनों में कच्चे माल का इस्तेमाल नहीं हो सकता।

पैकेजिंग मटेरियल भी हो जाएंगे महंगे

कंडोम निर्माण में लुब्रिकेंट के रूप में इस्तेमाल होने वाले सिलिकॉन ऑयल की कीमतें बढ़ी हैं। दरअसल यह मुख्य रूप से चीन से आता है, लेकिन इसकी सप्लाई चेन रिफाइनरी प्रोसेस और ग्लोबल लॉजिस्टिक्स से जुड़ी है।

जानकारी के अनुसार, कच्चे माल के साथ PVC फॉयल, एल्युमीनियम फॉयल और अन्य रसायनों की कीमतें भी अस्थिर हैं। ग्लोबल सप्लायर्स से माल न मिल पाने के कारण प्रोडक्शन और ऑर्डर्स को पूरा करने में भी देरी हो रही है।

फैमिली प्लानिंग पर पड़ेगा असर

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि कंडोम की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को प्रभावित करती है। यदि कीमतें बढ़ती हैं, तो गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल कम हो सकता है।

इसका सीधा असर अनचाहे गर्भ, मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर पर पड़ेगा। इसके साथ ही, यौन संचारित रोगों (STIs) के मामले भी बढ़ सकते हैं। भारत सरकार का लक्ष्य 2030 तक आधुनिक गर्भनिरोधक तरीकों की मांग को 75% तक पूरा करना है, लेकिन इस किल्लत की वजह से नेशनल फैमिली प्लानिंग प्रोग्राम के लक्ष्यों को झटका लग सकता है।


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